ये कैसा गणतंत्र है ?

भारत के सभी राज्यों और भारत सरकार ने हाल ही में 65वां गणतंत्र दिवस मनाया और ना जाने कितनी उपलब्धियाँ गिनाई। इस देश की और राज्यों की सरकारों ने क्या-क्या नही किया है गरीबों के लिए, बड़ी-बड़ी योजनाएँ चलातें हैं जिससे गरीबी मिट जाए लेकिन बेचारा गरीब तो लगभग वहीं का वहीं है परंतु जिन नेताओं को जिताया और सरकार ने जिन कर्मचारियों और अधिकारियों को सरकार में भर्ती किया, उनकी पौ-बारह जरूर हो गई क्योंकि वास्तव में कोई भी सरकार रही हो चाहे किसी भी दल की रही हो वह इस देश में आर्थिक असमानता को बढ़ाते ही गये इसके पीछे हमें कहीं ना कहीं सोचने की जरूरत है कि इसमें सभी दल और न्याय, समानता की सोच रखने वाले असफल क्यों रहे हैं?, हमारे देश में आज जवाबदेही कहीं बची है क्या? जिधर देखो उधर व्यवस्था के सभी अंग उंघे पड़े हैं और आम आदमी कहें या गरीब, दलित या वंचित कहें उनका ठेका कुछ लोंगों ने ले लिया और उनको भी सुलाने का काम किया जा रहा है। उनको जब जगाने की बात की जाती है तो सुलाने वाले लोगों के दिमाग ठनकने लगते हैं कि यह क्या हो रहा है ? खैर तो हम बात कर रहे थे, गणतंत्र की। मैं आप सभी से यह सवाल पूछना चाहता हूँ की क्या वास्तव में गणतंत्र है या माफियातंत्र है! जिधर देखो उधर ही माफिया नजर आते हैं और हम लोग माफियाओं के हाथ में यह देश और तंत्र सौंप देते हैं और बड़े खुश होते हैं कि इस बार तो हमने फलां को वोट दिया और सरकार बनवा दी। इस देश के ज्यादातर लोग ईमानदार होने का ढोंग करते हैं और जब सत्ता हाथ में आती है तो इस देश के गरीबों, दलितों, वंचितों की खून पसीने की कमाई डकार जातें हैं और वह गरीब, दलित, वंचित देखता रहता है और उसे पता भी नही चलने देते हैं, उसे लगता है कि यह तो सरकार का पैसा है खाने दो। दूसरा ये सभी, चाहे वह नेता हों या प्रशासनिक अधिकारी गरीब, दलित एवं वंचितों को इतना डराकर रखते हैं कि वह हमेशा ही डरा रहे।
हमारे देश के संविधान को लागू हुए 64 वर्ष बीत गये और 65वां वर्ष शुरू हो गया, क्या जो संविधान निर्माता बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को, संविधान सभा को सुपुर्द करते वक्त कहा था उस पर आज तक ध्यान दिया गया ? उन्हांेने कहा था कि इस संविधान में हम राजनीतिक समानता तो दे रहे हैं सभी को एक वोट डालने का ही हक होगा लेकिन आर्थिक और सामाजिक समानता स्थापित नहीं करके हम विरोधाभासी युग में प्रवेश कर रहे हैं। आज भी हमारे देश में जीतोड़ मेहनत करने वाले मजदूर के पास जीवित रहने के लिए मूलभूत चीजें रोटी, कपड़ा और मकान भी नही है. हमारे देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने स्वयं यह कहा था कि हमारे देश के बच्चों में से 44 प्रतिशत कुपोषित हैं लेकिन इस देश का दुर्भाग्य यह है कि कुछ बच्चे अतिपोषित भी नजर आते हैं जो मुफ्त का माल खाते हैं और जो प्रधानमंत्री जी ने कहा है वह तो सरकारी आंकड़ा है वास्तविक स्थिति तो उससे कही बदतर हैं। बच्चों की ही नही यदि गावों में रहने वाले स्त्री-पुरुषों की भी बात की जाए तो उनमें से भी ज्यादातर कुपोषित ही नजर आते हैं । इस देश के मेहनतकशो, आदिवासियो, दलितो उठो और अपने हिस्से की संपत्ति इन भ्रष्ट, माफिया और गददा्रों से छीन लो नही तो पता नही ये कब तक इसी प्रकार शोषण करते रहेंगे। यदि आप इन शोषकों और ब्राह्ममणवादी सोच के खिलाफ उठ खड़े होंगे तो आज के दिन बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
जय भीम, ज़िंदाबाद, लाल सलाम कॉमरेड्स

मुकेश गोस्वामी
सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान, राजस्थान एवं सूचना का अधिकार मंच के साथ जुड़े हुए हैं

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