हम कैसा लोकपाल चाहते हैं ?

देश मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ जन मानस उद्वेलित और आंदोलित है विभिन्न प्रकार के विचार शामने आ रहे हैं, सर्वाधिक चर्चित विषय – लोकपाल है, जिससे भ्रष्टाचार ख़तम होने की उम्मीद की जा रही है! इस समय देश की जनता के शामने प्रस्तवित लोकपाल कानून के तीन मसौदे हैं, एक मसौदा सरकार का है तथा दो मसौदे नागरिक समाज (सिविल सोसायटी ) की तरफ से आये हैं! एक परिपक्व लोकतंत्र मैं यह सामान्य बात है की विचारों की विविधता का सम्मान हो, असहमति को अभिव्यक्त करने की सबको जगह मिले !
अगर कोई पक्ष यह कहे की जो लोग जनलोकपाल के साथ नहीं है, वह सरकार के साथ हैं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि सरकार और अन्ना हजारे के इतर भी लोंगों के विचार हो सकते हैं तथा उन्हें प्रस्तुत करने का लोंगों को हक है, लेकिन एसा वातावरण बनाया जा रहा है कि जो अन्ना के साथ नहीं है वे भ्रष्टाचार के पक्षधर हैं !इतना ही नहीं बल्कि सूचना के जन अधिकार के रास्ट्रीय अभियान द्वारा एक वैकल्पिक लोकपाल को सिविल सोसायटी मैं दरार डालने वाला प्रयास भी बताया जा रहा है!
हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि न तो सरकार और न ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का इससे कोई सरोकार है, यह पूरी तरह से सूचना के जन अधिकार के राष्ट्रीय अभियान द्वारा बनाया गया ड्राफ्ट है, जिसे बनाने कि कवायद अन्ना हजारे के जंतर मंतर पर अप्रेल मैं किये गए अनशन से पूर्व ही शुरू हो गई थी तथा इसमें टीम अन्ना के कुछ सदस्य भी शुरूआती तौर पर इससे जुड़े रहे थे!
हम जनलोकपाल और सरकारी लोकपाल दोनों ही मसौदों से असहमत हैं क्योंकि सरकारी लोकपाल एक लुंज- पुंज कमजोर लोकपाल है जिससे प्रधानमंत्री को बाहर रखा गया है तथा शिकायत निवारण कि कोई प्रक्रिया ही नहीं राखी गई है ! उल्टा शिकायत करने वाले को हतोत्साहित करने के लिए झूठी शिकायत पाए जाने पर शिकायतकर्ता को २ से ५ वर्ष कि सजा और २५ हजार से २ लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है सरकार ने जो लोकपाल संसद के जरिये संसदीय स्थायी समिति को विचारार्थ भेजा है, उससे भ्रष्टाचार ख़तम करने कि ख़त्म करने कि दिशा मैं कोई लाभ होता नजर नहीं आ रहा है !
दूसरी ओर टीम अन्ना कि ओर से बनाये गए जनलोकपाल को बहद ताकतवर बनाया गया है ! कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सबके ऊपर होगा यह जनलोकपाल! यह पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक सबकी शिकायत सुनेगा यह सुनवाई करेगा, जाँच करेगा,और सजा भी देगा ! यह लोंगों की निजता का हनन करके फ़ोन ताप करेगा एस एम् एस ईमेल भी चेक करेगा तथा विना न्यायलय से वारंट लिए तलाशी भी लेगा! टीम अन्ना का कहना है की उनके द्वारा बनाया गया जनलोकपाल ही सर्वश्रेष्ठ है तथा वे इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे!
जनलोकपाल से हमारी असहमति यह है की इसे बहुत ज्यादा ताकतवर बनाये जाने के कारन, शक्ति की अधिकता के चलते यह निरंकुश और भ्रष्ट हो सकता है, जिससे हमारा लोकतंत्र ही नष्ट हो सकता है ! जिस प्रकार के जनलोकपाल की कल्पना की गई है वह संविधान के दायरे मैं तो व्यावाहारिक नहीं लगता है क्योंकि यह संविधान से भी ऊपर होगा तथा इसे देश भर की शिकायतें सुनने का अधिकार भी दिए जाने से यह शिकायतों के बोझ तले दब भी सकता है !
क्या इस प्रकार हम ‘आम आदमी’ के आन्दोलन के नाम पर शक्ति के विकेंद्रीकरण की हमारी संवैधानिक व्यवस्था, संसदीय जनतंत्र और संविधान की सर्वोच्चता पर अंगुली नहीं उठा रहे हैं! क्या हम दैत्य जैसा एक महाशक्तिशाली लोकपाल बनायें जो भ्रष्टाचार के साथ -साथ हमारे लोकतंत्र को ही ख़त्म कर दे ? क्या लोकतंत्र की कीमत पर हम इसे स्वीकार करना चाहेंगे ?
उपरोक्त लोकतान्त्रिक चिंताओं के मद्देनजर सूचना के जन अधिकार के राष्ट्रीय अभियान ने एक वैकल्पिक लोकपाल व्यवस्था प्रस्तुत की है जो इस प्रकार हो सकती है :
१. राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निवारण लोकपाल : इस लोकपाल के दायरे मैं प्रधानमंत्री, मंत्री , सांसद, विधायक, कलक्टर , एस पी अ ग्रेड के अफसर, कम्पनियाँ तथा गैर सरकारी संगठन (एन जी ओ ) होंगे! यह उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को ख़त्म करेगा!
२. केंद्रीय सतर्कता लोकपाल : वर्तमान मैं कार्यरत केंद्रीय सतर्कता आयोग (सी वी सी ) को स्वतंत्र किया जाये, उसके अधीन एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी काम करे! इसके दायरे मैं द्वितीय श्रेणी के समस्त कर्मचारियों को लाया जाये तथा जाँच के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं हो !
३. न्यायिक जवाबदेही लोकपाल : उच्चतम न्यायालय के कई जाने माने ईमानदार पूर्व मुख्या न्यायाधीशों का मानना है कि संविधान के मूलभूत उसूलों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि न्यायपालिका की स्वायत्तता को कायम रखा जाये! न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए संसद में ‘न्यायिक जवाबदेही एवं मानक अधिनियम’ विचाराधीन है इसमें बहुत कमियां हैं इन्हें दुरुस्त कर शीघ्र पारित किया जाये! साथ ही एक ‘न्यायिक जवाबदेही आयोग बने; जो न्यायपालिका को भ्रष्टाचार मुक्त कर जवाबदेह बना सके !
४. शिकायत निवारण लोकपाल : भ्रष्टाचार एवं शिकायतों में फर्क है इसलिए इनके निदान की प्रक्रिया एवं पध्दति भी अलग अलग होगी भ्रष्टाचार निवारण के ढांचे ऊपर से नीचे की ओर केन्द्रित रूप से काम करेंगे जबकि शिकायत निवारण का ढांचा नीचे से ऊपर की ओर विकेन्द्रित रूप से काम करेगा ! शिकायत सुनने, जाँच करने तथा उनका निवारण करने के लिए ब्लोक, जिला , राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर शिकाया निवारण अधिकरण बनाये जाएँ ताकि आम लोंगों को अपनी समस्यों का त्वरित समाधान मिल सके क्योंकि समस्याओं का निदान नहीं होने से भी भ्रष्टाचार फैलता है !
५. शिकायतकर्ता सरक्षण लोकपाल : शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा के लिए लोक सुरक्षा कानून (व्हिसल ब्लोवेर्स प्रोटेक्सन एक्ट ) भी संसद में विचारधीन है, इसको सशक्त किया जाये तथा शीघ्र लागू किया जाये ताकि लोग निर्भीक होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर सकें !
चूंकि भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नहीं होता है, आज वह कई रूपों में हर जगह फैलकर बहुआयामी हो गया है इसलिए इसका निदान भी बहुआयामी और बहुस्तरीय होना चाहिए ! हमारी स्पष्ट मान्यता है कि शक्ति किसी एक ढांचे में केन्द्रित न होकर कई ढांचों में मोजूद रहे ताकि निन्कुश्ता और तानाशाही का खतरा ही ख़त्म हो जाये ! संविधान बनाते वक्त यही हमारे संविधान निर्माताओं ने भी चाह था !
आज प्रश्न सरकारी लोकपाल या जनालोपाल का समर्थन करने या समर्थन नहीं करने का नहीं है सवाल हमारे संविधान, संसद और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का अक्षुण रखने का है ! इसलिए शांत मस्तिष्क से सोच विचार कर हमें देश हित में निर्णय करने की जरूरत है !
भंवर मेघवंशी
लेखक मजदूर किशन शक्ति संगठन के साथ कार्यरत हैं

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