अन्ना के आन्दोलन से दलितों के दूरी की वजहें

अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को देश भर में आशातित समर्थन मिल रहा है. मीडिया खबरों से अटा पड़ा है और तो सार्वजनिक स्थलों पर धरनार्थियों ने कब्जा कर रखा है. चारो ओर अन्ना- अनशन-आन्दोलन और धरना-प्रदर्शन एवं जन लोकपाल जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं. समकालीन भारत के इतने विशाल जनआन्दोलन से देश के दलित, आदिवासी, घुमन्तू और अल्पसंख्यक समुदाय ने एक दूरी बना रखी है. या तो वह चुप है अथवा उसके स्वर इस आन्दोलन और जनलोकपाल के खिलाफ जाते दिख रहे हैं.
आखिर ऐसी क्या वजह है, जिनके चलते करोड़ों की आबादी वाले ये समुदाय इस मुहिम से अछूते हैं. कोई भी नामचीन दलित, बुद्धिजीवी, समाज सेवक अथवा जनप्रतिनिधि और आम दलित, आदिवासी इसका भागीदार नहीं बन रहा है. मजदूर और किसान भी इस मुहिम से दूर ही है. फिर भी यह आन्दोलन लगातार पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहा है. इण्डिया अगेंस्ट करप्शन नामक संस्था जो कि अन्ना हजारे के आन्दोलन की आयोजक है. उसका दावा है कि वह देश के 120 करोड़ लोगों की प्रतिनिधि है. जब करोड़ों दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक इस मुहिम से दूर है फिर उनके नाम पर कौन और क्योंकर कोई दावे किये जा रहे हैं? शायद इसी प्रकार के स्वघोषित प्रतिनिधियों और मसीहाओं के आचरण के चलते ही दलित आदिवासी अपने को उपेक्षित महसूस करते है.
यह जानना भी उचित होगा कि जब अन्ना ने जंतर मंतर पर अनशन किया तो उनके बैनर पर भारत माता से लेकर गांधी, शिवाजी और लक्ष्मी बाई थे मगर अम्बेडकर-फुले उससे नदारद थे. हॉ भीड़ में, आरक्षण हटाओ – भ्रष्टाचार मिटाओ’ के नारे जरूर सुने जा सकते थे. जो दलित वहॉ गये भी तो आन्दोलन का आरक्षण विरोधी यह चरित्र देखकर निराश होकर लौट आए. इसके बाद लोकपाल के लिये बनी एक संयुक्त मसौदा समिति में पांच सदस्य सिविल सोसायटी की ओर से लिये गये. लेकिन इसमें एक भी दलित, आदिवासी या फिर अल्पसंख्यक नहीं थे. देश भर से जब दलित आदिवासी संगठनों ने यह आवाज उठाई तो इण्डिया अगेंस्ट करप्शन के संस्थापक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि कानून बनाने के लिये विषेशज्ञ चाहिये. दलितों को महसूस कराया गया कि आजादी के वक्त संविधान बनाने के लिये बनी मसौदा समिति की अध्यक्षता करने के लिये डॉ0 अम्बेडकर जैसे दलित उस वक्त मौजूद थे मगर आजादी के 64 बरस बाद दलित वर्ग में एक कानून ड्राफ्ट करने वाली समिति में जाने लायक एक भी विषेशज्ञ उपलब्ध नहीं है. मतलब दलितों की योग्यता पर सदैव की भांति यहाँ भी सवाल खड़े किये गये. इस बात का विरोध हुआ तो केजरीवाल बोले- सरकार रख ले किसी दलित को. मतलब कि आरक्षण सरकारी क्षेत्र में ही लागू है निजी क्षेत्र में नहीं. सिविल सोसायटी में नहीं. इससे दलित आहत हुए और उन्होंने स्वयं को ’एंटी करप्शन मूवमेंट’ के नाम पर खडे किये जा रहे ’एंटी रिर्जेवेशन मूवमेंट से बिल्कुल ही अलग कर लिया.
दलित आदिवासी पक्ष ने इस दौरान बेहद जायज सवाल उठाये कि अन्ना हजारे ने खैरलांजी तथा देश के विभिन्न हिस्सों में दलितों पर हुये लौमहर्षक अत्याचारों के वक्त क्यों अनशन नहीं किया? सलवा जुडुम के नाम पर आदिवासियों को नक्सलियों से भिड़ाने के सरकारी प्रयासो के विरूद्ध क्यों नहीं अनशन किया? शायद इसलिये नहीं कि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वर्ग के साथ होने वाले अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न से अन्ना तथा उनकी टीम का कोई सरोकार नहीं है. हजारों निर्दोष अल्पसंख्यकों के सामूहिक संहार होने देने वाले मुख्यमंत्री की प्रशंसा करके भी अन्ना ने साफ कर दिया कि साम्प्रदायिकता भी उनके लिये मुद्दा नहीं है. ऐसे में कैसे कोई दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक इस आन्दोलन का हिस्सा बन सकता है. ‘’अन्ना ही भारत है, जो अन्ना के साथ नहीं, वे सब चोर हैं. आरक्षण भ्रष्टाचार की जननी है.’’ जैसे नारे लगाकर क्या सन्देश दलितों को दिया जा रहा है. लाखों किसानों की महाराष्ट्र में हुई आत्महत्याओं पर अन्ना ने अनशन नहीं किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ कारपोरेट द्वारा वित्तपोषित आन्दोलन वाली अन्ना टीम क्या यह बता सकती है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण पर उनकी सोच क्या है? उनके आदर्श गांव रालेगान सिद्दी में दलितों की क्या स्थिति हैं? क्या वे ग्राम स्वराज की अवधारणा में वर्णवादी व्यवस्था के समर्थक हैं या विरोधी?
अब आते है टीम अन्ना के जन लोकपाल कानून पर. अन्ना की टीम जिस जन लोकपाल को लागू करवाना चाहती है वह इतना शक्तिशाली होगा कि उसे शिकायतें सुनने, जांच करने, गिरफ्तार करने, फोन टेप करने, ई -मेल और एस एम एस देखने तथा सजा देने तक से सर्वाधिकार प्राप्त होंगे. यह अत्यधिक शक्ति सम्पन्न जन लोकपाल देश के प्रधानमंत्री, संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका से भी ऊपर होगा, जबकि भारत का संविधान कहता है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सब को शक्तियां दी गई है मगर कोई एक-दूसरे पर हावी नहीं होगा. सबकी शक्तियां तय है ताकि कोई भी ढ़ांचा लोकतंत्र के लिये नुकसानदायी नहीं हो, मगर टीम अन्ना का जन लोकपाल हमारी संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के ऊपर एक संविधानेतर ढ़ांचा होगा, जिसके खूब अधिकार होंगे. देश में पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक सब उसके प्रति जवाबदेह होंगे मगर वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होगा. इस प्रकार एक वर्ग विशेष की अराजक भीड़ जन आन्दोलन के नाम पर देश के संविधान एवं संसदीय प्रक्रियाओं को ताक में रखकर तथा लोकतंत्र को ही खत्म करने पर आमादा है. हम सब जानते हैं कि इस देश के दलितों का संविधान के साथ भावनात्मक जुड़ाव है. अगर कोई संविधान से ऊपर जाकर लोकतंत्र को चुनौती देगा तो साफ है कि कोई भी दलित अन्ना हजारे की मुहिम के साथ नहीं जायेगा. शायद इस कारण ही अन्ना का अन्दोलन आज भी पूरे देश का आन्दोलन नहीं है. यह अब भी अंग्रेजी भाषी, मध्यमवर्गीय सवर्ण तबके के आन्दोलन के रुप में ही देखा समझा जा रहा है.
भंवर मेघवंशी
लेखक मजदूर किशन सकती संगठन के साथ कार्यरत हैं

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